दोस्ती

आज कल एक बात मन को खाए जा रही है। मेरे फेसबुक पे हजारों मित्र हैं,कुछ को जानती हूं और बहुतों को नहीं जानती हूं। जानने वालों को इसलिए मित्र बनाया कि उन्हें जानती हूं। मगर अब लगता है कि मैं तो किसी को जानती ही नहीं थी। मेरी लेखनी को पसंद करते हैं,मेरे कार्य को अच्छा बताते हैं,लेकिन मैसेंजर पर आकर। छिप कर । उन्हें ये जताने में शर्म आती है कि उन्हें मेरा लिखा पसंद आया है,आखिर क्यों??? 
बहुतों ने ये स्वीकार किया कि लोगों के डर से (कहीं गलत न समझ ले) वो हमसे सामने से बात नहीं करते लेकिन मेरी उपलब्धि को देख कर खुश होते हैं । 
कई सहेलियों ने भी कहा कि वो नहीं चाहती कि सब जाने की हम दोस्त हैं।
तो एक पंक्ति याद आती है
#क्या #बिगाड़ #के #डर #से #सच #न #कहोगे??

     समस्या किसे है भई और किस बात की? 
#यदि #मन #में #चोर #है #तुम्हारे 
#तो #दोस्त #नहीं #हम #तुम्हारे....#स्वरा

     तो दोस्तों आज से कान खोल कर सुन लो,ये मैसेंजर पर दोस्ती दिखाना बंद करो। शाबाशी देनी है तो सामने से नहीं तो नहीं दो। रखो अपनी बातें अपने ही दिल में। तुम जानने वालों से बेहतर मैं उन लोगों को मानती हूं जिन्हें मैं नहीं जानती। अब छंटनी शुरू दोस्तों
और हां फिर से विद्रोही स्वरा की विद्रोही लेखनी की श्रृंखला शुरू होने वाली है
बच के रहना किसका नाम आ जाए क्या पता🙏🙏🙏🙏🙏☺️

Comments

Post a Comment

Popular posts from this blog

बंजर में बहार

दर्द

स्त्रियां...