स्त्रियां...

मैंने इस संसार में अनेक चेहरे देखे हैं, अनेक स्वभाव, अनेक संबंध…पर सच कहूँ, कुछ स्त्रियाँ ऐसी होती हैं जिन्हें देखकर मन सहज ही श्रद्धा से भर जाता है। वे केवल मनुष्य नहीं लगतीं, वे किसी प्रार्थना का उत्तर प्रतीत होती हैं, किसी मंदिर में जलती अखंड लौ जैसी, किसी थके हुए जीवन पर ईश्वर के हाथ जैसी…

मैंने देखा है गंगा सी निर्मल और शांत स्त्रियों को, जिनकी आँखों में शोर नहीं, गहराई होती है। जो बोलती कम हैं, पर उनके मौन में पूरा ब्रह्मांड धड़कता है। वे वैसी ही होती हैं जैसे सावन की पहली वर्षा के बाद मिट्टी से उठती सौंधी सुगंध, जो बिना कुछ कहे आत्मा तक उतर जाती है।

कुछ स्त्रियाँ सचमुच गुलाब की पंखुड़ियों सी कोमल होती हैं। उनकी संवेदनाएँ इतनी नाज़ुक होती हैं कि किसी अपने की हल्की उदासी भी उन्हें भीतर तक भिगो देती है। वे अपने हिस्से के दुःख छुपाकर दूसरों के हिस्से की मुस्कान सीती रहती हैं। जैसे कोई माँ रातभर जागकर बच्चे के माथे पर पट्टी रखती रहे और सुबह वही बच्चा उसे मुस्कराता हुआ देखे तो वह अपनी सारी थकान भूल जाए। 

स्त्रियाँ अक्सर ऐसी ही होती हैं, टूटती हैं, पर बिखरती नहीं, रोती हैं, पर घर को रोने नहीं देतीं।

और फिर वही स्त्री जब परिवार पर संकट आता है, तो चट्टान बन जाती है। जिसे दुनिया कोमल समझती है, वही सबसे कठोर समय में सबसे अधिक मजबूत निकलती है। जिस हाथ में चूड़ियाँ खनकती हैं, वही हाथ पूरे घर की नींव थाम लेते हैं। जिसे लोग भावुक कहकर कमज़ोर समझ लेते हैं, वही स्त्री समय आने पर महाकाल के सामने खड़ी दुर्गा बन जाती है।

मैंने ऐसी स्त्रियों को देखा है जो स्वयं अधूरी रह जाती हैं, पर अपने बच्चों के सपनों को पूरा करने में पूरी उम्र लगा देती हैं। वे अपने नए वस्त्र टाल देती हैं ताकि पिता की दवा आ सके, अपनी इच्छाएँ दबा देती हैं ताकि भाई की पढ़ाई रुक न जाए, अपनी नींद गिरवी रख देती हैं ताकि पति चैन से सो सके और आश्चर्य देखिए, ये सब करते हुए भी उनके चेहरे पर शिकायत नहीं, केवल स्नेह होता है।

स्त्रियाँ सचमुच नदी जैसी होती हैं। नदी की तरह ही वे हर पत्थर सहती हैं, हर मोड़ से गुजरती हैं, फिर भी दूसरों को जीवन देना नहीं छोड़तीं। उनके भीतर त्याग हिमालय जैसा ऊँचा होता है, धैर्य धरती जैसा विशाल और प्रेम आकाश जैसा अनंत।

कभी-कभी मुझे लगता है कि ईश्वर ने संसार की सारी कोमलता, सारी करुणा और सारी सहनशीलता को एक साथ मिलाकर स्त्री का निर्माण किया होगा। वरना कोई साधारण मनुष्य कैसे इतना सह सकता है? कैसे कोई अपने आँसू पीकर दूसरों के लिए मुस्कुराहट बन सकता है? कैसे कोई स्वयं अंधेरे में रहकर पूरे घर के लिए दीपक बन सकता है?

मैंने ऐसी स्त्रियाँ देखी हैं जो घर में तुलसी के पौधे जैसी होती हैं। उनके होने भर से वातावरण पवित्र लगता है। वे बोलें तो लगता है जैसे मंदिर में शंख बज उठा हो, वे हँस दें तो लगता है जैसे बरसों से सूखी धरती पर बारिश उतर आई हो और वे उदास हो जाएँ तो पूरा घर सूना पड़ जाता है।

सच कहूँ, ऐसी स्त्रियाँ केवल रिश्ते नहीं निभातीं, वे पूरे परिवार की आत्मा बन जाती हैं। वे माँ हों, बहन हों, पत्नी हों या बेटी, उनके बिना घर केवल दीवारें रह जाता है, और शायद इसी लिए मुझे ऐसी स्त्रियाँ दैवीय स्वरूप लगती हैं। क्योंकि इस स्वार्थ से भरी दुनिया में भी उनका प्रेम निष्कलुष रहता है। उनका समर्पण पवित्र रहता है, उनकी ममता निस्वार्थ रहती है।

वे संसार की भीड़ में चलती हुई साधारण स्त्रियाँ नहीं लगतीं, वे किसी प्राचीन श्लोक की पवित्र पंक्तियाँ लगती हैं, किसी ऋषि की तपस्या का फल, किसी माँ की दुआ, किसी टूटे हुए इंसान के लिए ईश्वर का सबसे सुंदर उपहार। ❣️

Comments

Popular posts from this blog

बंजर में बहार

दर्द