बंजर में बहार

"मानवता का इल्म सिखाती
पुस्तक को अख़बार कहोगे??"

बंजर में बहार....विकास सोलंकी
समीक्षक: डॉ स्वराक्षी स्वरा
  
         वर्तमान परिपेक्ष्य में जब हर तरफ लेखकों की बाढ़ सी आ गई है। एक ही आधार पर कवि धड़ल्ले से लिख रहे हैं। ऐसे में मन में ग़जलों,गीतों के प्रति एक उबाऊपन का आना भी स्वाभाविक सी बात है। तब ऐसे समय में मन के बंजर में भावनाओं के पुष्प खिलाने विकास सोलंकी जी लेकर आएं हैं...."बंजर में बहार" । जैसा कि नाम से ही ज्ञात होता है। विविध भावों के बहारों को समेटती हुई ये पुस्तक वाकई में एक सुखद एहसास कराती है। जीवन की यथार्थता को अपनी लेखनी से संजोने वाले सोलंकी जी साधुवाद के पात्र हैं।
           गजलगों विकास सोलंकी जी की गजलें न केवल मौसकी पर हैं, वरन युवाओं की वर्तमान समस्या पर भी चोट करती हुई हैं।

"प्रश्न मेरे सामने तो आज भी कुछ यक्ष है
सोचता हूं क्यों युद्धिष्ठर द्रोण का प्रतिपक्ष है"
           अब बात करते हैं पुस्तक के भाव पक्ष और शिल्प पक्ष की ।
भाव पक्ष:....
 विकास सोलंकी जी की गजलें भावों से लबरेज हैं। हर भाव का समावेश कूट -कूट कर भरा हुआ है। भावनाओं में डूब कर लिखीं गई बात सीधी पाठक के दिल को छूती हैं...
"कितनी ख्वाहिश पाले हम
कितनी पीर संभाले हम।।"

और देखें...
चोट हजारों खा सकता हूं
फिर भी हाथ मिला सकता हूं""
           लोगों की सबसे बड़ी समस्या पर करारा व्यंग्य करते हुए कहा है.....
    लग गया है रोग मुझको
    क्या कहेंगे लोग मुझको ।।
 हालांकि लोग कहते कभी कुछ नहीं। जहां तक बात है शिल्प की तो,इस कसौटी पर भी इनकी गजलें खड़ी उतरती हैं। छोटी बहर में कही गईं गजलें आसानी से लोगों की जुबान पर चढ़ती हैं। बहर का निर्वाहन करती हुईं सभी गजलें कथ्य की दृष्टि से भी शानदार हैं....
दिन को काली रात कहेंगे
जुगनू की सब बात करेंगे।।

चोट हजारों खा सकता हूं
फिर भी हाथ मिला सकता हूं।।
            पूरी जिंदगी को एक शेर में बांधने का क्या कमाल प्रयास किया है इन्होंने,देखें...

   एक नज़र भर है जिंदगी
   एक सफ़र भर है जिंदगी।।
                        हम देखते हैं कि इनकी पुस्तक में यथार्थ का सौंदर्य है तो संबंधों की मधुरता भी शामिल है। समस्याओं की विकटता है तो संस्कारों की विवशता भी । सम्पूर्ण पुस्तक का सार यही कहता है कि विकास सोलंकी जी एक बेहतरीन गजल कार के रूप में बिहार का पर्याय बनेंगे । मेरी ओर से हार्दिक शुभकामनाएं! नए कहने वालों को इनकी पुस्तक अवश्य पढ़नी चाहिए.....
"रोशनी का रहनुमा कैसे कहूं मैं आपको
तीरगी में एक दीपक गर जला सकते नहीं"

                 शुभेच्छु:
          डॉ स्वराक्षी स्वरा
    गीतकार खगड़िया,बिहार 
          

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