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एपस्टीन फाइल...काला पर्दा

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एपस्टीन फाइल को लेकर आजकल भारत में हाहाकार मचा हुआ है.. यहां के लोग हैरान हैं कि विदेश के अमीर पुरुष कितने दरिंदे हैं? गरीब लोग दरिंदगी को अमीरी से जोड़ रहे, आस्तिक लोग दरिंदगी को नास्तिकता से जोड़ रहे..  कुछ तथाकथित राष्ट्रवादी दरिंदगी को वेस्टर्न कल्चर से जोड़ रहे.. ताकि एक बात आराम से कही जा सके कि हम उनके जैसे नहीं हैं।" जैसे भारत में कोई गरीब, कोई आस्तिक धार्मिक, कोई संस्कृति रक्षक किसी नाबालिग बच्ची का कभी रेप ही न किया हो! सच्चाई ये है कि दरिंदगी की कोई क्लास,कोई धर्म,कोई संस्कृति नहीं होती। पितृसत्ता दुनिया में हर जगह है, बस कहीं थोड़ा कम,थोड़ा ज्यादा है।  भारत में रोज बच्चियों से बलात्कार होता है। मंदिरों में,घरों की चारदीवारी में, देवी पूजक समाज में और अपराधी कोई विदेशी अमीर नहीं, बल्कि अक्सर पिता,भाई,चाचा, गुरु,मौलवी, पुजारी,पड़ोसी होता है। यह पितृसत्तात्मक मानसिकता का ही परिणाम है। और एपस्टीन फाइल में बच्चियों का मांस खाने की जो बात है, वो हमारे भारत के लिए नया नहीं है। निठारी कांड के नरभक्षी सुरेंद्र कोली को भूल गए क्या? कितनी बच्चियां अपहरण करके खा ली...

स्त्रियां...

मैंने इस संसार में अनेक चेहरे देखे हैं, अनेक स्वभाव, अनेक संबंध…पर सच कहूँ, कुछ स्त्रियाँ ऐसी होती हैं जिन्हें देखकर मन सहज ही श्रद्धा से भर जाता है। वे केवल मनुष्य नहीं लगतीं, वे किसी प्रार्थना का उत्तर प्रतीत होती हैं, किसी मंदिर में जलती अखंड लौ जैसी, किसी थके हुए जीवन पर ईश्वर के हाथ जैसी… मैंने देखा है गंगा सी निर्मल और शांत स्त्रियों को, जिनकी आँखों में शोर नहीं, गहराई होती है। जो बोलती कम हैं, पर उनके मौन में पूरा ब्रह्मांड धड़कता है। वे वैसी ही होती हैं जैसे सावन की पहली वर्षा के बाद मिट्टी से उठती सौंधी सुगंध, जो बिना कुछ कहे आत्मा तक उतर जाती है। कुछ स्त्रियाँ सचमुच गुलाब की पंखुड़ियों सी कोमल होती हैं। उनकी संवेदनाएँ इतनी नाज़ुक होती हैं कि किसी अपने की हल्की उदासी भी उन्हें भीतर तक भिगो देती है। वे अपने हिस्से के दुःख छुपाकर दूसरों के हिस्से की मुस्कान सीती रहती हैं। जैसे कोई माँ रातभर जागकर बच्चे के माथे पर पट्टी रखती रहे और सुबह वही बच्चा उसे मुस्कराता हुआ देखे तो वह अपनी सारी थकान भूल जाए।  स्त्रियाँ अक्सर ऐसी ही होती हैं, टूटती हैं, पर बिखरती नहीं, रोती हैं, पर घर क...

शिक्षक बनाम गुलाम

कहते हैं कि शिक्षक किसी भी राष्ट्र की रीढ़ होते हैं। यदि शिक्षकों का अपमान होता है तो घनानंद सम मृत्यु और सम्मान होने पर चंद्रगुप्त सम विजय पाई जाती है। लेकिन हमारी बिहार सरकार और उसके शिक्षा अधिकारियों को इसकी कतई परवाह नहीं है। प्रचंड गर्मी हो या भीषण ठंड , ओले बरस रहें हो या बाढ़। इनकी नजर में शिक्षक अमृतपान किए हुए होते हैं जो हर हाल में रह सकता है। लेकिन वास्तविक में ऐसा होता नहीं है।         कोई कहते हैं कि शिक्षकों से इन्हे काफी उम्मीद होती है और भरोसा भी कि ये दिए हुए कार्य को सफल अवश्य बनाएंगे,तो ठीक है,ये अच्छी बात है,लेकिन एक सवाल ये भी आता है की यदि इन्हें शिक्षक इतने ही प्रिय होते हैं तो फिर शिक्षकों की इतनी लाचार स्तिथि क्यों? क्यों आखिर एक शिक्षक सम्मान की नजर पाने में भी असमर्थ है?  इतनी भीषण ठंड में भी सरकार ने शिक्षकों को जनगणना के कार्य में लगा दिया है। एक तरफ तो सरकारी आदेश पारित कर स्कूलों में छुट्टी घोषित कर दीं,ताकि जनता इनसे खुश हो सके और दूसरी ओर उसी आदेश को अवहेलित करते हुए शिक्षकों को कार्य पर लगा दिया ।ये कहां का न्याय है?  यदि आ...

दोस्ती

आज कल एक बात मन को खाए जा रही है। मेरे फेसबुक पे हजारों मित्र हैं,कुछ को जानती हूं और बहुतों को नहीं जानती हूं। जानने वालों को इसलिए मित्र बनाया कि उन्हें जानती हूं। मगर अब लगता है कि मैं तो किसी को जानती ही नहीं थी। मेरी लेखनी को पसंद करते हैं,मेरे कार्य को अच्छा बताते हैं,लेकिन मैसेंजर पर आकर। छिप कर । उन्हें ये जताने में शर्म आती है कि उन्हें मेरा लिखा पसंद आया है,आखिर क्यों???  बहुतों ने ये स्वीकार किया कि लोगों के डर से (कहीं गलत न समझ ले) वो हमसे सामने से बात नहीं करते लेकिन मेरी उपलब्धि को देख कर खुश होते हैं ।  कई सहेलियों ने भी कहा कि वो नहीं चाहती कि सब जाने की हम दोस्त हैं। तो एक पंक्ति याद आती है #क्या #बिगाड़ #के #डर #से #सच #न #कहोगे??      समस्या किसे है भई और किस बात की?  #यदि #मन #में #चोर #है #तुम्हारे  #तो #दोस्त #नहीं #हम #तुम्हारे....#स्वरा      तो दोस्तों आज से कान खोल कर सुन लो,ये मैसेंजर पर दोस्ती दिखाना बंद करो। शाबाशी देनी है तो सामने से नहीं तो नहीं दो। रखो अपनी बातें अपने ही दिल में। तुम जानने वालों से बेहतर म...

सफलता का डर

बिल्कुल सही सुना आपने। आज सभी सफल होने के लिए नहीं डर रहे बल्कि,सफल हो जाने के डर से डर रहे हैं। कैसे? आइए जानते हैं।    जब से समाज पितृसत्तात्मक बना है तब से हुआ पुरुषों को अपने पुरुषत्व को बनाए रखने हेतु अनेकों प्रयास करने पड़ते रहे हैं। साम,दंड भेद,कूटनीति,छलनीति सभी अस्त्रों का प्रयोग केवल और केवल नारी स्वातंत्र्य दमन हेतु ही उठाया गया है। फिर चाहे वो सीता हरण हो,सीता रक्षण हो या सीता त्याग हो। हर जगह केवल दोष नारी पर लगा कर स्वयं को सही साबित किया है।             सीता हरण हुआ,क्योंकि उन्होंने लक्ष्मण  रेखा को पार कर एक साधु को अपने स्वभाव अनुसार दान देने का प्रयास किया (यह तो सर्वविदित है की नारी स्वभाव से ही वात्सल्य पूर्ण और करुणामई होती है ।)फिर यदि उसने इस स्वभाव की वजह से रेखा को पार करने का प्रयास किया तो वो दोषी कहां, कैसे और क्यों?          आज तक इन सवालों पर किसी ने भी प्रश्न उठाने का साहस नहीं किया किंतु यहां सीता दोषी अवश्य पाई जाती है , क्योंकि उन्होंने एक पुरुष के द्वारा खींची गई रेखा को नारी होने के...

प्रदूषण से बचाव

आलेख *प्रदूषण से बचने की दिशा में मेरे कदम*        प्रदूषण शब्द ही प्रदूषित प्रतीत होता है ।अब जिस शब्द में ही दोष आ जाये उससे शुद्धता की क्या अपेक्षा की जा सकती है ।दूषण अर्थात दूषित ,,,जिसमे विकार आ जाये या जो बेकार हो जाये ।     आज के वैज्ञानिक युग ने चाहे कितनी भी तरक्की क्यों न कर ली हो,परन्तु प्रकृति पर अपनी सत्ता कायम कर पाने में असमर्थ ही रहा है,इसलिए तो आज प्रकृति की विकृति को सही कर पाने में असक्षम है ,तभी तो बढ़ती हुई प्रदूषण की समस्या ने एक भयंकर बीमारी का रूप धर लिया है ,जिसमें मनुष्य ही नहीं सम्पूर्ण सृष्टि जकड़ी हुई है । अपने क्षणिक सुख की आपूर्ति हेतु मानव ने इस हद तक प्रकृति का दोहन किया है अब स्वयं ही मानव इसका शिकार होने लगा है ।हमने प्रकृति को इतना कमजोर कर दिया है कि अब वो हमारे बोझ को संभाल पाने में असमर्थ है ।प्रदूषण की बढ़ती गति ने हमारी *नीली परी* के अस्तित्व पर ही खतरा  बढ़ा दिया ।        हम सभी जानते हैं कि मनुष्य को स्वस्थ रहने के लिए स्वच्छ पर्यावरण की आवश्यकता होती है और एक अच्...

घरेलू पुरुष

*घरेलू पुरुष* यह वाक्य सुनने में जितना हास्यास्पद लगता है,उतना ही असम्भव भी। यह हमारे समाज की विडंबना है कि प्रगति के उच्चतर स्तर तक आ कर भी हमारी सोच परम्परागत ही है।हम भले ही पश्चमी सभ्यता में खुद को रंग कर स्वतंत्र विचारक बोल इतरा लें,किंतु सच्चाई यही है कि हमारे आधुनिक लिबास के भीतर एक रूढ़िवादी सोच रखने वाला इंसान ही है....जिसका मानना है कि "घरेलू" शब्द केवल महिलाओं के लिए ही उपयुक्त है। वे खुद भले बेरोजगार हो घर पर बैठे रहें,किंतु खुद को "घरेलू"कहलाना पसंद नहीं करते हैं। वहीं दूसरी तरफ महिलाएँ चाहे कितनी भी ऊंची पोस्ट पर जॉब क्यों न कर रही हो,उन्हें घरेलू कहना ही पसंद करते हैं।            अब प्रश्न ये है कि --- *क्या एक कामकाजी महिला "घरेलू-पुरुष" के साथ रहना पसंद करती है या नहीं?* महिला किसी भी परिस्थिति में स्वयं को ढालने की काबिलियत रखती है। वो अपने आप को हर रूप में सुंदर और सहज तरीके से ही ढाल लेती है। चाहे पति कमाता हो या न हो,लेकिन उसमें उसे समझने के गुण अवश्य मौजूद रहने चाहिए। लेकिन एक लड़के को "घरेलू" बन कर रहना कभी भी स्वीकार नहीं हो...