शिक्षक बनाम गुलाम
कहते हैं कि शिक्षक किसी भी राष्ट्र की रीढ़ होते हैं। यदि शिक्षकों का अपमान होता है तो घनानंद सम मृत्यु और सम्मान होने पर चंद्रगुप्त सम विजय पाई जाती है। लेकिन हमारी बिहार सरकार और उसके शिक्षा अधिकारियों को इसकी कतई परवाह नहीं है। प्रचंड गर्मी हो या भीषण ठंड , ओले बरस रहें हो या बाढ़। इनकी नजर में शिक्षक अमृतपान किए हुए होते हैं जो हर हाल में रह सकता है। लेकिन वास्तविक में ऐसा होता नहीं है।
कोई कहते हैं कि शिक्षकों से इन्हे काफी उम्मीद होती है और भरोसा भी कि ये दिए हुए कार्य को सफल अवश्य बनाएंगे,तो ठीक है,ये अच्छी बात है,लेकिन एक सवाल ये भी आता है की यदि इन्हें शिक्षक इतने ही प्रिय होते हैं तो फिर शिक्षकों की इतनी लाचार स्तिथि क्यों? क्यों आखिर एक शिक्षक सम्मान की नजर पाने में भी असमर्थ है?
इतनी भीषण ठंड में भी सरकार ने शिक्षकों को जनगणना के कार्य में लगा दिया है। एक तरफ तो सरकारी आदेश पारित कर स्कूलों में छुट्टी घोषित कर दीं,ताकि जनता इनसे खुश हो सके और दूसरी ओर उसी आदेश को अवहेलित करते हुए शिक्षकों को कार्य पर लगा दिया ।ये कहां का न्याय है? यदि आपने उन्हे कार्य में लगाया है तो उनकी सुधि भी लेना सुनिश्चित करें।
हद तो ये है की अभी न तो मीडिया कर्मी और न ही गांव के ग्रामीणों को इस पर आपत्ति है। एक भी ऐसी आवाज नहीं सुनाई दी कि आखिर क्यों?
हां MDM की बात हो,या राशि की भनक या की पांच महीने के बकाए वेतन भुगतान की खबर इनकी चीखें इतनी तेज हो जाती हैं की कोसो दूर बैठ कर भी सुनाई देती है।
"शिक्षकों की बल्ले बल्ले मिलेंगे एकमुश्त एरियर और वेतन की राशि"
"शिक्षको के खाते में आयेंगे राशि,होगी इनकी दिवाली"
आब तै मास्टर बा सब के मौजे छै, इत्ते रूपा आयते""
जैसे वाक्यों से कान फटने लगते हैं। इन सब के बीच पांच महीने गायब से हो जाते हैं इनकी नजरों से। काश!कभी आपने उन पांच महीनों के दर्द को भी अपनी आवाज से गुंजाइयत किया होता! कभी समझा होता शिक्षकों की हालत को और दिया होता साथ तो आज आपके बच्चों की शैक्षणिक स्थिति इतनी कमजोर न होती।
MDM के जाल में फंसी शिक्षा व्यवस्था पर डाली होती अपनी पैनी नज़र तो शायद समझ पाते एक शिक्षक की हकीकत को!
अभी भी समय नहीं गुजरा है।बचा लें मटीयामेट हो रही शिक्षा व्यवस्था को। बचा लें गुरुओं के सम्मान को ताकि आपके बच्चों का भविष्य सम्मानित हो सके।
स्वराक्षी स्वरा
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