घरेलू पुरुष
*घरेलू पुरुष*
यह वाक्य सुनने में जितना हास्यास्पद लगता है,उतना ही असम्भव भी। यह हमारे समाज की विडंबना है कि प्रगति के उच्चतर स्तर तक आ कर भी हमारी सोच परम्परागत ही है।हम भले ही पश्चमी सभ्यता में खुद को रंग कर स्वतंत्र विचारक बोल इतरा लें,किंतु सच्चाई यही है कि हमारे आधुनिक लिबास के भीतर एक रूढ़िवादी सोच रखने वाला इंसान ही है....जिसका मानना है कि "घरेलू" शब्द केवल महिलाओं के लिए ही उपयुक्त है। वे खुद भले बेरोजगार हो घर पर बैठे रहें,किंतु खुद को "घरेलू"कहलाना पसंद नहीं करते हैं। वहीं दूसरी तरफ महिलाएँ चाहे कितनी भी ऊंची पोस्ट पर जॉब क्यों न कर रही हो,उन्हें घरेलू कहना ही पसंद करते हैं।
अब प्रश्न ये है कि --- *क्या एक कामकाजी महिला "घरेलू-पुरुष" के साथ रहना पसंद करती है या नहीं?* महिला किसी भी परिस्थिति में स्वयं को ढालने की काबिलियत रखती है। वो अपने आप को हर रूप में सुंदर और सहज तरीके से ही ढाल लेती है। चाहे पति कमाता हो या न हो,लेकिन उसमें उसे समझने के गुण अवश्य मौजूद रहने चाहिए। लेकिन एक लड़के को "घरेलू" बन कर रहना कभी भी स्वीकार नहीं होता है।
आप अपने आस- पास ही नजर उठा कर देखेंगे तो पाएंगे कि बहुत से ऐसे रिश्ते हैं जो इसी तरह बेमेल के हैं। दरअसल किसी भी रिश्ते को बनाये रखने के लिए उसमें विश्वास,आदर और प्रेम का होना अति आवश्यक होता है। परंतु जब एक पत्नी कमाती हो और पति घरेलू हो तो उनके रिश्ते में इन्हीं चीजों की कमी हो जाती है। पत्नी के कुलीग,बॉस, रिश्तेदार सब से पति को ईर्ष्या होने लगती है। पत्नी की खुशी से उसे जलन प्रदान करता है। पत्नी का हंसना-मुस्कुराना उन्हें अपना उपहास उड़ाने जैसा लगता है। घर का काम करना उन्हें अपनी पत्नी की गुलामी करने जैसी लगती है। किसी सहयोगी से मजाक तो पत्नी के लिए अभिशाप के समान ही हो जाता है,क्योंकि तुरंत ही उंगली उसके चरित्र पर उठ जाती है।
ऐसा नही है कि ये दुर्भावनाएं केवल पति के मन मे ही उठती है,वरन कई दफे ये भावनाएं पत्नियों के मन मे भी जन्म ले ही लेती हैं। जब छोटी-छोटी बातों पर दोनों में आये दिन लड़ाइयां होने लगती हैं। बात-बेबात पर टोकना अखरने लगता है। शक की चिंगारी जब प्रचंड आग का रूप धारण कर लेती है,तब उनके रिश्ते में सिवाय नफ़रत, शक और अलगाव के कुछ नहीं बचता ।
इसलिये मेरी राय में ये रिश्ता कभी भी सफल नहीं पायेगा। एक कुंठा हमेशा ही किसी न किसी के मन मे पलती रहेगी ।यूँ भी कहावत है *खलिमन शैतान का घर* और ऐसे में ये शैतान अपने मन की ही करवाएगा।
इन खाली वक़्त में पुरुष के मन मे अनेकों दुर्विचार करवटें ले रहा होता है,जो शाम को पत्नी को सामने पाते ही फुट पड़ता है। बात बेबात पर ताना देना,गाली देना,चरित्रहीनता का लांछन लगाना आदि । गाली सेशुरू हुई बात,अंत मे थप्पड़ पर आकर खत्म हो जाती है।
दरअसल इसमें उनका दोष नहीं है,क्यूंकि बचपन से ही समाज में वो देखता आया होता है कि स्त्री पुरुष के पीछे रहने वाली होती है। जब शादी होती है तो स्त्री उसके लिए सहयात्री, हमसफ़र या संगिनी न होकर,,,सम्पति,अनुगामिनी व बंदिनी होती है और इसी हक़ से वो अपनी *चीज* को अपनी मर्जी से चलाए रखने में विश्वास करता है। उसे अपनी अनुगामिनी का यूँ स्वतंत्र रूप से हंसना,जीना या निर्णय लेना कतई स्वीकार नहीं होता है।
अतः मेरे अनुभवानुसार भी यह शीर्षक------ *घरेलू पुरुष* की कल्पना करना भी बेमानी है। धरातल पर *घरेलू* होने का वरदान केवल महिलाओं को ही प्राप्त है,और उसी की रहेगी।
*स्वराक्षी स्वरा*
*खगड़िया बिहार*
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