सफलता का डर

बिल्कुल सही सुना आपने। आज सभी सफल होने के लिए नहीं डर रहे बल्कि,सफल हो जाने के डर से डर रहे हैं। कैसे? आइए जानते हैं।
   जब से समाज पितृसत्तात्मक बना है तब से हुआ पुरुषों को अपने पुरुषत्व को बनाए रखने हेतु अनेकों प्रयास करने पड़ते रहे हैं। साम,दंड भेद,कूटनीति,छलनीति सभी अस्त्रों का प्रयोग केवल और केवल नारी स्वातंत्र्य दमन हेतु ही उठाया गया है। फिर चाहे वो सीता हरण हो,सीता रक्षण हो या सीता त्याग हो। हर जगह केवल दोष नारी पर लगा कर स्वयं को सही साबित किया है।
            सीता हरण हुआ,क्योंकि उन्होंने लक्ष्मण  रेखा को पार कर एक साधु को अपने स्वभाव अनुसार दान देने का प्रयास किया (यह तो सर्वविदित है की नारी स्वभाव से ही वात्सल्य पूर्ण और करुणामई होती है ।)फिर यदि उसने इस स्वभाव की वजह से रेखा को पार करने का प्रयास किया तो वो दोषी कहां, कैसे और क्यों? 

        आज तक इन सवालों पर किसी ने भी प्रश्न उठाने का साहस नहीं किया किंतु यहां सीता दोषी अवश्य पाई जाती है , क्योंकि उन्होंने एक पुरुष के द्वारा खींची गई रेखा को नारी होने के बावजूद भी पार किया ;इसलिए उसका हरण हुआ ।यहां ना तो रावण दोषी है और ना ही लक्ष्मण और ना ही श्री राम दोषी केवल सीता है क्योंकि वह नारी है। 
    अब बात करते हैं सूर्पनखा की उनकी नाक कट गई क्यों, क्योंकि उन्होंने भी एक नारी होने के बावजूद सामने से एक पुरुष को प्रणय निवेदन कर दिया ।(सदियों से यह हक केवल पुरुषों को प्राप्त है जो आज भी है )आज भी कहीं कोई नारी सामने से किसी पुरुष को पसंद कर ले और कह दे कि हां मैं तुम्हें पसंद करती हूं ,तुमसे प्यार करती हूं तो, सवाल उसकी पसंद नापसंद को छोड़कर सीधे चरित्र पर आ जाती है ,कि यह लड़की जरूर चरित्र से कमजोर होगी तभी तो यह सामने से आकर निवेदन कर रही है। यहां मानव स्वभाव का कोई भी मूल्य नहीं रहता । सभी जानते हैं ,समझते हैं कि मानव स्वभाव है एक दूसरे लिंग के प्रति आकर्षण का होना ।परंतु यह आकर्षण भी आज के तथाकथित समाज में केवल और केवल पुरुषों के लिए ही है ।नारियों को यह हक बिल्कुल भी नहीं है कि वह किसी को स्वयं से पसंद कर ले और सामने से कहने की हिम्मत रख सके यदि वह ऐसा करती है तो उसका हश्र भी सुरपनखा की तरह ही हो जाता है। 
   इसके आगे देखें यदि पुरुष चाहे तो एक दो या उससे भी अधिक शादियां कर सकता है संबंध बनाए रख सकता है और यहां तक की एक ही स्त्री से कई पुरुष संबंध बनाए रखते हैं फिर भी.. फिर भी वह पुरुष गलत नहीं होते और विडंबना यह देखिए कि उन सभी नारियों को जिनके साथ पुरुषों ने गलत किया है अपने कुकृत्य को सही साबित करने हेतु उन्हें कोई ना कोई वरदान या कोई ऐसी बातें उनके जेहन में डाल दी गई ताकि उन्हें लगे कि यदि ऐसा है तो ही यह संभव है। जिस प्रकार से किसी रोते हुए बच्चों को चुप करवाने हेतु कोई खिलौना दे दिया जाता है ठीक उसी प्रकार से नारी के प्रश्न उठाने से पहले ही उसके चुप हो जाने के प्रबंध कर दिए जाते हैं।
      जैसे आप द्रोपदी का उदाहरण ले सकते हैं पांच पुरुषों ने मिलकर एक नारी से संबंध बनाए और उन्हें पतिव्रता होने का वरदान दे दिया और ऐसा करके उन्होंने अपने कृत्य को सही साबित कर दिया। यही एक पल को सोच कर देखें कि यदि द्रोपदी ने स्वयं से पांच पति कर लिए होते तो आज कहानी कुछ और ही होती तुरंत उनके चरित्र पर लांछन लगा दिए जाते, परंतु ऐसा नहीं हुआ क्योंकि यह कृत्य पुरुषों के द्वारा किया गया था और पुरुष तो कभी गलत करते ही नहीं ।आप इतिहास उठा कर देख ले हर जगह नारियों को ही दोष की सूली पर रखा गया है।
   अब आईए देखते हैं उन स्त्रियों को जिन्होंने अपने मन की स्वतंत्रता को ध्यान में रखा और अपनी इच्छा जग जाहिर कर दी ।श्री राधा रानी उन्होंने शादी के बाद भी कृष्ण से संबंध रख कृष्ण को अपना सर्वस्व माना तो उन्हें प्रेयसी का ही दर्जा मिला पत्नी का नहीं। श्री राधा रानी ने जरूर यह सवाल श्री कृष्ण से किया होगा तो उन्हें भी वरदान स्वरुप अपने साथ अमरता प्राप्त हुई कि लोग जब भी नाम लेंगे कहेंगे राधे श्याम।
उसके बाद के इतिहास पर देखिए भक्त मीरा को। उन्होंने भी एक नारी होने के बावजूद एक पुरुष (श्री कृष्ण )को अपना सर्वस्व अर्पण कर दिया बदले में उन्हें अनेक यातनाएं सहनी पड़ी परंतु उन्हें भी अमृत की प्राप्ति हुई ।और भी कई उदाहरण है जहां नारियों का आचरण ही उन्हें प्रसिद्धि दिलाता है। आप अमृता प्रीतम को ही देख लीजिए उन्होंने भी अपने मन की स्वतंत्रता को जगह दिया बदले में उन्हें क्या मिला ?
 यह पुरुष प्रधान समाज कभी भी किसी स्त्री को स्वयं की इच्छा से कोई भी निर्णय लेने का अधिकार नहीं देता है और दे भी कैसे ? परंतु आप मन की चिड़ियां को कब तक भला बांध पाओगे?  ये एक न एक दिन पिंजड़ा तोड़ कर उड़ ही जायेगी। 
              अब बात करते हैं कि ऐसा हुआ क्यों?धर्मशास्त्र भी यही कहता है की नारियां पुरुष की अनुगामी होती हैं तो फिर यहां एक सवाल उठता है जो किसी चीज के या किसी व्यक्ति के पीछे पीछे चलने वाली थी आखिर आगे आने को क्यों मचल गई? अनुगामी से अग्रगामी बनने की लालसा क्यों? जब आप इस बात का आकलन करेंगे तो पाएंगे कि इसके जिम्मेदार कहीं न कहीं पुरुष ही हैं। यदि आपके कदम सही राह पर चल रहे होते तो आपके पीछे चलने वाली अनुगामिनी यूं पथ भ्रष्ट न होती । इसे और अधिक सरल भाषा में समझें....
इंद्र ने यदि भावनाओं पर काबू किया होता तो अहिल्या पत्थर की न होती!
युधिष्ठिर ने यदि जुआ न खेला होता और खेल में अपनी पत्नी,अपना मान न हारा होता तो द्रोपदी यूं सभा बीच निर्वस्त्र न की जाती!

युधिष्ठिर ने यदि द्रोपदी हारा नहीं होता
तो दुशासन ने चीर यूं फाड़ा नहीं होता।।(स्वरा)

      बहुत से ऐसे उदाहरण आपको मिल जाएंगे जहां नारियों को पथभ्रष्ट करने का पाप पुरुषों ने किया है,किंतु उस पाप की भागी हमेशा नारियां ही बनती आई हैं। आज का समाज,बदला हुआ परिवेश हमे बार बार आगाह कर रहा है,किंतु हम उसे आधुनिकता का चोला पहना कर आनंदित हुए जा रहे हैं। 
अब आने वाली पीढ़ियों में क्या बचा रहेगा???ये आज सोचने की जरूरत है। 
तो सोचें और बताएं।


डॉ स्वराक्षी स्वरा

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