न जाने तुम कब आओगे???

गर्मी शबाब पर है,और पानी की किल्लत भी। प्यासे लोग,प्यासी धरती के सहारे हैं। धरती भी क्या करे? अपना सीना चाक किये हैं। सीना निचोड़-निचोदनकर प्यास बुझा रही है। हम भी दुहने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ रहे हैं,लेकिन यह कब तक चलेगा? धरती को भी खुश्की चाहिए !
हर साल पानी संजोने के कुछ नए और अनोखे तरीकों पर बात शुरू होती है। पड़ोसी राज्य यू पी में भू-गर्भ जल विभाग ने इस बार एक नायाब सलाह दी है । कॉलोनियों में बने पार्कों का स्तर मकानों से करीब एक मीटर नीचे रखा जाए;ताकि बारिश का पानी पार्कों में ही जाए । धरती का सीना तरो-ताजा रहें। इन पर अमल करने में कोई हर्ज तो नहीं है,लेकिन होगा नहीं क्योंकि हम भारतीय हैं,जिनकी परम्परा रही है----
     *हम कहना जानते हैं,करना नही*
तो भला हम अपनी परंपरा कैसे तोड़ सकते हैं?
है न ??????


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