14 सितंबर हिंदी दिवस
*"हिन्दी दिवस= 14 सितंबर"*
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"निज भाषा उन्नति अहै,सब उन्नति को मूल!
बिन निज भाषा ज्ञान के, मिटे न हिय को शूल!"
भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने निज भाषा के महत्व के महत्व को रेखांकित करते हुए यह उम्मीद की थी कि आम-आवाम की भाषा हिन्दी का विकास हो और प्रतिष्ठा बढ़ाने का कार्य हो।स्वतंत्रता संग्राम के मुख्य पुरोधाओं ने महसूसा कि जन-जन की भाषा,जिसमें हम एक-दूसरे को ज्यादा समझ सकते हैं,को ही संपर्क भाषा के रूप में बढ़ावा देकर ही आजादी की लड़ाई को एकजुट होकर जीता जा सकता है।साहित्य और संस्कृति में भी सामंजस्य स्थापित करने में मदद मिलेगी।उन दिनों अहिन्दी भाषी नेताओं ने हिन्दी की पैरोकारी की थी।महात्मा गांधी-मराठी-गुजराती ने, सुभाष चंद्र बोस-(बंगाली) ने, राजगोपालाचारी-मद्रासी ने,फादर कामिल बुल्के -रूसी, डा.ग्रियर्सन सहित सभी प्रमुख सेनानियों ने ये अच्छी तरह भांप लिया कि लोगों के बीच हिन्दी सर्वाधिक स्वीकार्य है।इसलिए भारत की आजादी के बाद संविधान सभा ने 14 सितंबर 1949को हिन्दी को राजभाषा के रूप में स्वीकार किया और तब से हम 14 सितंबर को हिन्दी दिवस मनाते आ रहे हैं।लेकिन क्या अब भी हिन्दी राष्ट्रभाषा बन पाई है? क्या किसी भी देश में भाषादिवस मनाया जाता है?इसका स्पष्ट अर्थ है कि हिंदी आज भी अपने पद से महरूम है व अपने समुचित स्थान पाने को जद्दोजहद कर रही है।ये भी ध्यातव्य है कि सरकारी काम- काज और उच्चाधिकारियों के कार्यालयों में हिन्दी अंग्रेजी की दासी बनी हुई है। आजादी के 75 वें वर्ष में भी यह कहावत प्रचलित है कि अंग्रेज चले गये,अंग्रेजियत छोड़ गये। लेकिन हमें निराश नहीं होना है। आज विश्व के दो तिहाई भाग के लोगों में हिन्दी सीखने की ललक बढ़ी है।आईये हम इस पुनीत अवसर पर संकल्प लें कि हम हिन्दी के अधिकाधिक शब्दों का प्रयोग करेंगे औ मैथिली शरण गुप्त के शब्दों में थोड़ा संशोधन करते हुए निष्कर्षत: यह कहना चाहती हूं कि- *जिसको नहीं निज देश औ निज भाषा का अभिमान है,*
*वह नर नहीं निरा पशु है औ मृतक समान है!*
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*"स्वराक्षी स्वरा, खगड़िया-बिहार!"*
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