बिहार बनाम नई शिक्षा नीति
*बिहार*
बिहार :- जो कभी शिक्षा का केंद्र हुआ करता था। यहां कई ऐसे विश्वविद्यालय हैं,जो अपने गौरवमयी इतिहास को बड़े गर्व से बयां करता रहा है। बौद्धों का प्रिय प्रवास रहने वाला बिहार अपने इसी गौरव को खोने की कगार पर खड़ा है। शिक्षा के राजनीतिकरण और सरकार की अकर्मण्यता ने मिलकर इसकी नैय्या को गर्त में डुबोने का पूरा इंतज़ाम कर ही दिया है ।
बिहार शैक्षणिक-दृष्टि से इतना समृद्ध रहा है कि इसका परिणाम हर साल "आई आई टी और संघ लोक सेवा आयोग" में देखने को मिलता रहता है,किन्तु फिर भी बिहार को शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़ा ही माना जाता है। आख़िर इसका वास्तविक कारण क्या है?
क्यों हमे बिहारी होने पर गर्व की अनुभूति नहीं हो पाती है? क्यों हम खुद को बिहारी बताने से हिचकते हैं? क्यों आख़िर बिहार की गिनती गंवारों और लठैतों में होती है..?
बिहार में आये दिन ही नई-नई शिक्षा नीति लायी जाती है।करोड़ों रुपये का बजट इसके पीछे बर्बाद किया जाता है,लेकिन वांछित परिणाम से बिहार वंचित ही रह जाता है। 14 वर्ष के सभी बच्चों को शिक्षित करने का लक्ष्य तो सरकार हर बार ही रखती है,किन्तु उसकी सफलता आज तक 100% तो छोड़िए 60%भी सुनिश्चित नहीं हो पाती है। ये 14 साल के बच्चे स्कूलों की बजाय आपको हर छोटी-बड़ी दुकानों,गैराज या ऑटो रिक्शा में ज्यादा नजर आते हैं। MDM,पोशाक, पुस्तक,नवाचार, शून्य निवेश,प्रोत्साहन राशि आदि-आदि कई प्रलोभनों के बाद भी बच्चे स्कूल नहीं,काम पर जाते हैं।
आख़िर इसका दोषी कौन.....हमारी शिक्षा नीति..या हमारे शिक्षक अथवा की हमारी सरकार की गलत नीतियां..???
आख़िर बिहार के भविष्य को अज्ञानमय बनाने का वास्तविक दोषारोपण किस पर......स्वयं सोचे और उत्तर दें।
धन्यवाद🙏
*स्वराक्षी स्वरा*...✍️
*खागड़िया बिहार*
सुंदर
ReplyDeleteजी बहुत आभार
Deleteनीतीश बाबू को खुद अंदाज नहीं है, कि जिनके लिए ऐसी नीतियाँ बना रहे हैं उन्हीं का सबसे अधिक नुकसान कर डाला है इन्होंने । चिंतनीय विषय तो है ही ।
ReplyDeleteजी बिल्कुल सही कहा,यदि समय रहते सुधार न हुआ तो स्थिति बद् से बद्तर होती चली जायेगी।
Deleteइसके जिम्मेदार हम सभी हैं। जहां सरकार कुछ मायनों में दोषी है वहीं अभिभावक और शिक्षक दोनो दोषी हैं। आज जो सरकारी विद्यालय और शिक्षक के प्रति समाज का नजरिया बदला है क्या उसके उसके लिए हम शिक्षक कम ज़िम्मेदार हैं? ऐसा नहीं है कि हम अपनी छोटी छोटी विसंगति के कारण अपना गौरव और अपनी गरिमा खोते जा रहे हैं? ऐसा भी नहीं है कि शिक्षा नीति अपने उद्देश्य को पूरा करने में सफल नहीं हो पा रही है बल्कि ये कह सकते हैं कि अपेक्षाकृत कम सफल हो रही है।इसके कई कारण हैं।आज फेसबुकिया शिक्षक और बच्चे हैं। बच्चे अब व्हाट्सएप चेटिंग करते हैं।उन्हें किसी सवाल का जबाब पाने के लिए गुरु जी के दरवाजे पर दस्तक देने की जरूरत नहीं होती।अब गांव में लालटेन नही जलते और न गुरु जी किसी के दरवाजे पर रहकर विद्यालय जाते हैं। अब न तो कक्षा में नैतिक शिक्षा की पुस्तकें चलती हैं और न ही गुरु जी कथा वाचते हैं। अब कोई अभिभावक शिक्षक को अपने दरवाजे पर रखना अपनी शान नही समझते हैं। बल्कि वे हिचकते और डरते हैं। परिवेश बदल रहा है जिसका असर हरेक गतिविधि पर पड़ता है। पहले विभिन्न ऊंचे पदों पर तैनात नेता,पदाधिकारी शिक्षक को अपना रिश्तेदार बताते थे और आज शिक्षक उनसे रिश्ता जोड़ते हैं। जैसे जैसे समय बदलता है वैसे वैसे लोगो की प्रकृति और जबतक सबों की मानसिकता नहीं बदलेगी तबतक कोई कुछ नहीं कर पाएंगे। इसके लिए हमें आगे आकर अपनी भूमिका बखूबी निभानी पड़ेगी।⁶ सरकारी आदेशानुसार घंटी के पहले 15 मिनट बच्चों को पाठ की भूमिका से रूबरू कराने के लिए है।लेकिन शायद ऐसा 1 / शिक्षक करते हैं।ऐसा नहीं है कि आज शिक्षको को सम्मान नहीं मिलता या बच्चे परामर्श नहीं लेते। बल्कि आज भी पढ़ाने वाले शिक्षकों को समाज में आदर मिलता है। यदि हम अपने में छोटी छोटी सुधार कर लें तो समाज का नजरिया सरकारी स्कूलों और शिक्षकों के प्रति बदलेगा ।
ReplyDeleteऔर शिक्षा नीति जरूर सफल होगी।
संगीता चौरसिया
आपका कहना भी सही है। यदि शिक्षक ही इसके जिम्मेदार है तो इनको सुधारने का प्रयास कौन करेगा??? यदि शिक्षक अपनी जिम्मेदारियों से किनारा कर रहे हैं तो आखिर क्यों?? इस सभी सवालों के भी तो जवाब ढूढने होंगे न।
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